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अमृतलाल नागर का संक्षिप्त जीवन परिचय
साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा 1981 में पद्म भूषण से सम्मानित हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर की पढ़ाई हाईस्कूल तक ही हुई। फिर स्वाध्याय द्वारा साहित्य, इतिहास, पुराण, पुरातत्व व समाजशास्त्र का अध्ययन किया। बाद में हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला, अंग्रेजी पर अधिकार प्राप्त किया। पहले नौकरी, फिर स्वतंत्र लेखन, फ़िल्म लेखन का खासा काम किया। ‘चकल्लस’ का संपादन भी किया। आकाशवाणी, लखनऊ में ड्रामा प्रोड्यूसर भी रहे। वे उन्नीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य के महत्त्वपूर्ण लेखक थे जिन्हें अक्सर प्रेमचंद का साहित्यिक वारिस माना जाता है।
शुरूआत में मेघराज इंद्र के नाम से कविताएं लिखीं। ‘तस्लीम लखनवी’ नाम से व्यंग्यपूर्ण स्केच व निबंध लिखे तो कहानियों के लिए अमृतलाल नागर मूल नाम रखा। उनकी भाषा सहज, सरल दृश्य के अनुकूल है। मुहावरों, लोकोक्तियों, विदेशी तथा देशज शब्दों का प्रयोग आवश्यकतानुसार किया। भावात्मक, वर्णनात्मक, शब्द चित्रात्मक शैली का प्रयोग उनकी रचनाओं में हुआ है।
लखनऊ के जनजीवन और बोली का जितना शानदार चित्रण उनकी रचनाओं में मिलता है उतना शायद कहीं नहीं। लखनऊ की भाषा को उन्होंने पूरी तरह से अपनी घुट्टी में पी लिया था। वे एक ऐसे लेखक थे जो किसी संकीर्ण मतवाद से प्रतिबद्ध नहीं थे। वे प्रगतिशील साहित्यकारों के बीच भी उतनी सहजता से बैठते थे, जितना अपने विरोधियों के बीच। उनकी रचनाओं की ख़ास बात होती थी उसकी विषय वस्तु पर किया गया शोध। एक तरह से वे उपन्यासों के माध्यम से हमारे कई सौ सालों का सामाजिक इतिहास लिख रहे थे। वे किसी भी ऐतिहासिक कथा को लिखने से पूर्व पचासों पुस्तकें पढ़ते थे। उनसे नोट्स बनाते थे और इससे भी बड़ी बात जिस घटना को वे लिख रहे होते थे, वहीं जा कर बस जाते थे।”
उनको पद्मभूषण के अलावा काशी नागरी प्रचारिणी सभा, प्रेमचंद पुरस्कार, अखिल भारतीय वीर सिंह देव, साहित्य वाचस्पति और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्था के सर्वोच्च भारत भारती सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया। सात वर्षों के दौरान उन्होंने 14 फिल्में भी लिखीं, जिनमें से आठ सुपरहिट रहीं। 23 फरवरी, 1990 को वे पंचतत्त्व में समाहित हो गए।

अमृतलाल नागर की कालजयी कृतियाँ, राजपाल एंड संस द्वारा प्रकाशित
मानस का हंस : 1972 में प्रकाशित यह उपन्यास रामचरितमानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास के जीवन पर लिखा गया है। इस उपन्यास में तुलसीदास का जो स्वरूप चित्रित किया गया है, वह एक सहज मानव का रूप है। यही कारण है कि ’मानस का हंस’ हिन्दी उपन्यासों में ‘क्लासिक’ का सम्मान पा चुका है और हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि माना जाता है। नागरजी ने इसे गहरे अध्ययन और मंथन के पश्चात अपने विशिष्ट लखनवी शैली में लिखा है।
नाच्यौ बहुत गोपाल : ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ यशस्वी साहित्यकार अमृतलाल नागर का, उनके अन्य उपन्यासों की लीक से हटकर सर्वथा मौलिक उपन्यास है। वस्तुतः ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ की कथा का संगुम्फन एक बहुत व्यापक कैनवास पर किया गया है। ढाई-तीन वर्षों के अथक परिश्रम से, विभिन्न मेहतर-बस्तियों के सर्वेक्षण व वहां के निवासियों के ‘इंटरव्यू’ के आधार पर लिखी गई इस बृहत् औपन्यासिक कृति में नागरजी के सहृदय कथाकार और सजग समाजशास्त्री का अद्भुत समन्वय हुआ है।
आँखों देखा ग़दर : विष्णुभट्ट गोडशे द्वारा 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एकमात्र आँखों देखा विवरण और नागर जी का सरल और सटीक अनुवाद।

हम फ़िदा-ए-लखनऊ : लखनऊ और अवध सदा से अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिए विख्यात रहा है। नज़ाकत और नफासत के लिए विशेष रूप से जानी जाने वाली लखनवी संस्कृति आज भी वहां के जन-मानस में जि़न्दा है। वहाँ के निवासियों का यह कहना सच ही है कि ‘हम फिदा-ए-लखनऊ, लखनऊ हम पे फिदा’। जीवन भर लखनऊ में रहने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर की ये कहानियाँ मनोरंजन के साथ लखनऊ के जनजीवन के हर पहलू को उजागर करती हैं।
चकल्लस : अमृतलाल नागर की लेखनी से हास्य-व्यंग्य मिश्रित जिन विभिन्न रचनाओं का सृजन हुआ वे अपने आप में विलक्षण हैं। ये समय-समय पर विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं। उनके कई संग्रह निकले जिन्हें बेहद पसन्द किया गया। ‘चकल्लस’ के नाम से उन्होंने एक पत्र भी निकाला जिसका साहित्य जगत में अपना एक विशेष स्थान बन गया। ‘चकल्लस’ में नागर जी की सभी श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य रचनाएँ एक साथ प्रकाशित हैं।
खंजन नयन : जीवनी शैली में लिखी यह सूरदास के गरिमामय जीवन पर आधारित कृति है। डेढ़ वर्ष की साधना के पश्चात नागर जी ने महाकवि की निर्वाण-स्थली परासौली में बैठकर यह उपन्यास पूरा किया था।

एक दिल हजार अफसाने : एक दिल हजार अफसाने सुविख्यात कथाकर अमृतलाल नागर की 75 मर्मस्पर्शी और सशक्त कहानियों का संग्रह है। इस संग्रह में एक विशिष्टता यह है कि इसमें रचनाकार की सारी कहानियाँ एक साथ संग्रहित हैं।
महाभारत : भारतीय संस्कृति में महाभारत जी एक विशेष स्थान प्राप्त है। रामायण की भाँति इसे घर-घर में पढ़ा जाता है। नागर जी ने महाभारत की सम्पूर्ण कथा बड़े सरल शब्दों तथा प्रवाहपूर्ण भाषा में प्रस्तुत की है।
सात घूंघट वाला मुखड़ा : यह उपन्यास अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दौर में उत्तर भारत की राजनीति में ज़बरदस्त हलचल मचा देने वाली बेगम समरू के रहस्य और रोमांच से भरे जीवन पर आधारित है।
टुकड़े-टुकड़े दास्तान : ज़िंदगी के ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह लिखी जाने वाली सामान्य आत्मकथाओं से भिन्न परंतु उनसे अधिक पठनीय और सार्थक- प्रख्यात लेखक नागर जी की विशिष्ट आत्मकथा।
नवाबी मसनद : ‘नवाबी मसनद’ अपने समय में लोकप्रिय हुई। निराला जी इसके नियमित पाठक और प्रशंसक थे।
बाल साहित्य में नटखट चाची, बाल महाभारत, अक्ल बड़ी या भैंस भी प्रचलित हैं।

अमृतलाल नागर की कालजयी कृतियाँ
मानस का हंस : 1972 में प्रकाशित यह उपन्यास रामचरितमानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास के जीवन पर लिखा गया है। इस उपन्यास में तुलसीदास का जो स्वरूप चित्रित किया गया है, वह एक सहज मानव का रूप है। यही कारण है कि ’मानस का हंस’ हिन्दी उपन्यासों में ‘क्लासिक’ का सम्मान पा चुका है और हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि माना जाता है। नागरजी ने इसे गहरे अध्ययन और मंथन के पश्चात अपने विशिष्ट लखनवी शैली में लिखा है। बृहद् होने पर भी यह उपन्यास अपनी रोचकता में अप्रतिम है।

अमृतलाल नागर की कालजयी कृतियाँ
खंजन नयन : जीवनी शैली में लिखी यह सूरदास के गरिमामय जीवन पर आधारित कृति है। डेढ़ वर्ष की साधना के पश्चात नागर जी ने महाकवि की निर्वाण-स्थली परासौली में बैठकर यह उपन्यास पूरा किया था।

अमृतलाल नागर की कालजयी कृतियाँ
नाच्यौ बहुत गोपाल : ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ यशस्वी साहित्यकार अमृतलाल नागर का, उनके अन्य उपन्यासों की लीक से हटकर सर्वथा मौलिक उपन्यास है। वस्तुतः ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ की कथा का संगुम्फन एक बहुत व्यापक कैनवास पर किया गया है। ढाई-तीन वर्षों के अथक परिश्रम से, विभिन्न मेहतर-बस्तियों के सर्वेक्षण व वहां के निवासियों के ‘इंटरव्यू’ के आधार पर लिखी गई इस बृहत् औपन्यासिक कृति में नागरजी के सहृदय कथाकार और सजग समाजशास्त्री का अद्भुत समन्वय हुआ है।

अमृतलाल नागर की कालजयी कृतियाँ
हम फ़िदा-ए-लखनऊ : लखनऊ और अवध सदा से अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिए विख्यात रहा है। नज़ाकत और नफासत के लिए विशेष रूप से जानी जाने वाली लखनवी संस्कृति आज भी वहां के जन-मानस में जि़न्दा है। वहां के निवासियों का यह कहना सच ही है कि ‘हम फ़िदा-ए-लखनऊ, लखनऊ हम पे फ़िदा’। जीवन भर लखनऊ में रहने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर की ये कहानियाँ मनोरंजन के साथ लखनऊ के जनजीवन के हर पहलू को उजागर करती हैं।

मानस का हंस

खंजन नयन

नाच्यो बहुत गोपाल

हम फ़िदा-ए-लखनऊ
Publisher : Popular Prakashan Ltd ,India (30 March 2016); Rajpal and Sons; Address – 1590 Madarsa Road, Kashmere Gate, Delhi – 110006; Ph – +911123869812
Language : Hindi
Paperback : 176 pages
ISBN-10 : 9350643758
ISBN-13 : 978-9350643754
Item Weight : 185 g
Dimensions : 20.32 x 12.7 x 1.27 cm
Country of Origin : India
Net Quantity : 1 count
Packer : Rajpal and Sons; Address – 1590 Madarsa Road, Kashmere Gate, Delhi – 110006; Ph – +911123869812
Generic Name : Book
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