Bargad Kaat Do (Hindi) : Short Stories on Social Harmony | Contemporary Fiction | Stories | Social Awakening | Emotions & Relationships | Hindi Literature | Indian Writing

Bargad Kaat Do (Hindi) : Short Stories on Social Harmony | Contemporary Fiction | Stories | Social Awakening | Emotions & Relationships | Hindi Literature | Indian Writing
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Bargad Kaat Do by K.P.S. Verma (Author)

Bargad Kaat DoBargad Kaat Do

जनता के सामने ये कहानियाँ पहली बार आ रही हैं। मुझे लिखने का शौक छात्र जीवन से रहा।

रामचंद्र राय अपनी जिंदगी से बेहद परेशान हो गए थे। वे अपने इलाके के पार्षद थे, इलाके के एक इंटर कॉलेज में टीचर भी थे। उनकी पार्टी में उनकी इज्जत थी, पर घर में उनकी बीवी, बच्चे, माँ-बाप उनसे कटते थे। पड़ोसी तक कन्नी काटते थे।वे पिता से कहते थे कि उस देश के खिलाफ बहुत घटिया बोला, मेरा वश चले तो उस देश के हर आदमी को गोली से उड़वा दें। यही अपने भाषण में बोलने पर तालियाँ बजती थीं, पिता सुलझे हुए व्यक्तित्व थे। रामचंद्र की बात सुनकर बिना कुछ बोले चले जाते।पत्नी से कहते कि उन्हें लड़कियों के फैशन से नफरत है, उनका वश चले तो लड़कियों को शादी-ब्याह के अलावा सजना-सँवरना बैन कर दें। पत्नी सुनकर बिना जवाब दिए, अपने काम में लग जाती।बेटे को कहते कि बहन पर नजर रखा करो। जमाना खराब है, तो बेटा सुनकर बिना जवाब दिए दोस्त के घर चला जाता। लड़की से कहते कि बेटी, इतने छोटे कपड़े पहनने से तुम्हें क्या मिलता है तो वह मुँह फुलाकर अपने कमरे में चली जाती। माँ ने तो आना ही बंद कर दिया था।धीरे-धीरे घर में सब होते हुए भी वह अकेला महसूस करने लगे। घर में सबकुछ था। लड़के की जॉब लग गई थी तो आर्थिक हालत भी ठीक थी। पर उन्हें उन साले…से नफरत थी, जो खाते देश का थे, पर जिन्हें कुछ और ही चाहिए।वे इसलिए भी परेशान थे कि कल तक जो उनके यहाँ झाड़ू लगाता था, उनका लड़का पी.सी.एस. में आ गया। इस तरह तो सारा सामाजिक ढाँचा ही बिगड़ जाएगा, पर उनकी यह बात खुद उनके अपने घरवाले नहीं समझते तो और कौन समझेगा। शायद सामाजिक ढाँचा बिगड़ने से ज्यादा मन में जलन रही हो, कारण रामचंद्र के क्षोभ का।शहरी आदमी थे। इंटरनेट पर पढ़ते-पढ़ते कि किसान टैक्स नहीं देते और वे देते हैं, उन्हें किसानों से चिढ़ हो गई थी। सारे-के-सारे देशद्रोही हैं, पता नहीं सरकारें उन पर टैक्स क्यों नहीं लगातीं? सब साला वोट का चक्कर है। पिताजी को एक बार बोला तो बोली, “किसान बन जाओ, फिर टैक्स देना और साथी किसानों को भी बोलना,” और यह कहकर वे मुँह बनाकर अपने कमरे में चले गए।धीरे-धीरे वे अकेले पड़ते गए, लोग उनकी बातें सुनकर कन्नी काटने लगे, जबकि उन्हें लगता था कि वे एक महान् समाज-सुधारक का काम कर रहे थे। समाज को अपने हजारों साल पहले की वैभवशाली परंपरा की तरफ ले जाना चाहते थे, जिसमें सब अपना जातिगत धंधा करें। देश और दुनिया को सही रास्ता दिखाने की कोशिश कर रहे थे। आखिरकार वे एक कॉलेज टीचर थे। पार्षद तो अभी बने थे।दुनिया से उनका मन और खिन्न होने लगा, कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था। अब वे बहुत चिड़चिड़े हो गए थे, खुद से ही बड़बड़ाने लगे थे।

अनुक्रम

5 अक्तूबर मंगलवार है

और बड़े सिरदर्द दादाजी

बगल की सीट पर जवान लड़की

बैंक ऑफ खुशी-अहसान

बरगद काट दो

चलती डस्टबिन

केबिन-डी के मुसाफिर

ई साहब लेखपाल नहीं बन पाए, अउर का

एड़ियाँ घिसते एकलव्य

घासी सरकंडा

गवर्नमेंट कोटेवाले

हमारे देश की गाड़ी कहाँ से मिलेगी, बाबू साहब

जानते हो, मैं रेलवे में क्या था?

जिंदगी का मिसमैच

लंबी भौजी की लंबी दास्तान

लाफिंग बुद्धा और प्रो. आलमगीर

मसूरी में जादू की कोठरी

मेरा अजीबोगरीब सपना

मेरे पड़ोसी के घर करवाचौथ

मेरी मॉब लिंचिंग

नेताजी के सिंगापुर दौरे से मिली सीख

नॉर्थ इंडियन की सदर्न पोस्टिंग

पनखऊ की बबिता

पेड़ की डाँट

फिर आपका देश इतना गरीब क्यों?

रेलवे का टूर भत्ता और डाकू

रामास्वामी की कहानी का अजीब किराएदार

रूरल इंडिया से दिमाग की चोरी

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Publisher ‏ : ‎ Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.; 2021st edition (18 September 2021); Prabhat Prakashan Pvt. Ltd., 4/19, Asaf Ali Raod, New Delhi-110002 (PH: 7827007777) Email: prabhatbooks@gmail.com
Language ‏ : ‎ Hindi
Hardcover ‏ : ‎ 184 pages
ISBN-10 ‏ : ‎ 9390923646
ISBN-13 ‏ : ‎ 978-9390923649
Item Weight ‏ : ‎ 350 g
Dimensions ‏ : ‎ 1.19 x 15.24 x 22.86 cm
Importer ‏ : ‎ (PH: 7827007777)
Packer ‏ : ‎ Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.,
Generic Name ‏ : ‎ Book

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